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Aniruddhanbapuchegunsnkirtn

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परमपूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू के घर संपन्न हुआ श्री सप्तमातृका-पूजन

परमपूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू के घर संपन्न हुआ श्री सप्तमातृका-पूजन

मंगलवार, दि. ८ दिसंबर २०१५ को परमपूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू के घर के श्री सप्तमातृकापूजन संपन्न हुआ। आपको यह शुभ समाचार देते हुए मैं बहुत ही आनन्दित हूँ कि बापू के घर नये मेहमान का आगमन हुआ है। आप सब को यह जानकर खुशी होगी कि सुचितदादा के बेटे स्वप्निलसिंह और बापू की बेटी शाकंभरीवीरा को पुत्रसंतान की प्राप्ति हुई है।

८ दिसंबर २०१५ को अस्पताल से नवजात शिशु का आगमन बापू और सुचितदादा के आवासस्थल हॅपी होम में हुआ। सर्वप्रथम सारे परिवार ने श्रीगुरुक्षेत्रम् में चण्डिकाकुल के दर्शन कर शिशु के लिए आदिमाता चण्डिका से आशीर्वाद-प्रार्थना की। घर में प्रवेश करने से पहले वैदिक प्रार्थना तथा नवमन्त्रमाला स्तोत्र का पाठ करते हुए शिशु का औक्षण किया गया।

परिजनों एवं आप्तमित्रों ने बॅंडबाजे के साथ जमकर नाचते हुए नये मेहमान के घर आने की खुशी मनायी। बापू, नन्दाई और सुचितदादा भी हर्ष-उल्लास के साथ इसमें सम्मिलित हुए। इस शुभ अवसर पर सुचितदादा ने बापू को मिठाई खिलायी।

बालक का आगमन होते ही उसी दिन शाम को घर में श्री सप्तमातृकापूजन का आयोजन किया गया। आदिमाता की कृपा से बच्चे को निरामय दीर्घायु प्राप्त हो, इस उद्देश्य से श्रद्धावान श्री सप्तमातृकापूजन करते हैं। इस पूजन का उद्देश्य, महत्व और पूजनपद्धति के बारे में बापूजी ने २४ अक्तूबर २०१३ के प्रवचन में मार्गदर्शन किया है।

‘श्री मातृवात्सल्यविंदानम्’ ग्रन्थ में हम पढते हैं कि शुंभ-निशुंभ नाम के राक्षसों से लड़ते समय महासरस्वती की सहायता के लिए सभी देव अपनी अपनी शक्ति भेजते हैं। वे सात शक्तियां ही सप्तमातृकाएं हैं और उनकी सेनापति है आह्लादिनी काली।

इन सप्तमातृकाओं का पूजन स्वयं बापू के जन्म के बाद उनके घर में किया गया और उसी विधि से श्रद्धावान अपने घर यह पूजन करते हैं। सप्तमातृका-पूजन की कथा एवं महत्त्व के बारे में बताते हुए बापू ने कहा था, “शुंभ और निशुंभ के वध के बाद शुंभ का पुत्र दुर्गम बच निकला। लेकिन उसे कौए का रूप दिया गया इसलिए वह बच गया ऐसा नहीं है, बल्कि उसे देखकर इन सात मातृकाओं का मातृभाव जागृत हुआ और इसलिए उन्होंने मातृत्व की भावना से शत्रु के बालक को भी जीवनदान दिया। उनकी इस वत्सल कृति से प्रसन्न होकर महासरस्वती ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि ‘जो भी मानव अपने बच्चे के जन्म के बाद इन सात मातृकाओं का पूजन करेगा, उस बालक की तुम सातों रक्षक बनना।’ इसी कारण बच्चे के जन्म के पश्चात् इन सात मातृकाओं का पूजन करने की प्रथा शुरू हुई।

बापू के घर भक्तिमय वातावरण के साथ सनई-चौघडे की धुन में इस पूजन का प्रारंभ हुआ। नवजत शिशु के पिता श्री. स्वप्निलसिंह ने अपने बेटे के लिए यह पूजन किया। शिशु के मामा श्री. पौरससिंह ने पूजाविधि बतायी। बापू, नन्दाई और सुचितदादा पूजन में संपूर्ण समय उपस्थित थे और वे मन्त्र-स्तोत्र पाठ में सब के साथ सम्मिलित हुए।

‘वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥’ इस श्लोक के साथ पूजन की शुरुआत हुई और संपूर्ण पूजन भक्तिभावसहित किया गया। गुरुक्षेत्रम्‌मंत्र, सद्गुरु-मन्त्र और नवमंत्रमाला स्तोत्र का पाठ भी सब ने मिलकर किया। फिर धूप-दीप और नैवेद्य अर्पण किया गया। तत्पश्चात् सब ने पूजन की कथा सुनी और फूल अर्पण करके सप्तमातृकाओं को वन्दन किया।

बापू की पोती और नातिन के घर आते ही बापू के यहाँ श्री सप्तमातृकापूजन किया गया था। जीवन के हर एक क्षेत्र में आदिमाता चण्डिका की भक्ति ही सर्वप्रथम है, आदिमाता का स्मरण कर उनसे आशीर्वाद लेकर ही हर एक कार्य का प्रारंभ बापू करते हैं। सप्तमातृकापूजन हो, श्रीदत्तयाग हो, पराम्बापूजन हो, गणपति उत्सव हो या अन्य पर्व, त्यौहार या उत्सव हो, हर कार्य में बापू के द्वारा किये गये अध्यात्म-भक्ति के इन्हीं संस्कारों का अनुभव हम बापू के घर करते हैं।

ll हरि: ॐ ll ll श्रीराम ll ll अंबज्ञ ll
॥ जय जगदंब जय दुर्गे ॥

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परमपूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू के घर संपन्न हुआ श्री सप्तमातृका-पूजन
परमपूज्य सद्गुरु श्री अनिरुद्ध बापू के घर संपन्न हुआ श्री सप्तमातृका-पूजन
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